MFF Diary – Day 1 (updated)

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जाग मुसाफिर, भोर भई…

वैसे अभी आधा दिन ही गुज़रा है लेकिन बीच में काम से बाहर निकलना पड़ा तो थोड़ा वक्त मिल गया सुबह की दो फिल्मों के बारे में जल्दी से लिखने का.

पहली फिल्म (१० बजे वाली) देखने के लिए कुछ मैं घर से देर से निकला और कुछ बंबई के ट्रैफिक ने अपनी काली शक्ल दिखा दी. बीच में एक भीड़ वाले सिग्नल पर, जहाँ हवलदार को खड़ा होना चाहिए था एक हाथी खड़ा था जनता से सिक्के बटोरने की जुगत में. सुबह सुबह हाथी को बीच शहर ऐसे कैसे घुसने दे सकते हैं ये सवाल सृष्टि में मैं पहला आदमी नहीं हूँ जो पूछ रहा है, लेकिन मेरे हिसाब से इस सवाल का जवाब ढूँढना ज़रूरी है.

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मगरमच्छ का पहला शिकार

मेरी खुशकिस्मती से, फिल्म ज़रा देर से शुरू हुई. फिल्म थी Pierre Scholler की The Minister. Synopsis में लिखा था satire है इसलिए बड़ी उम्मीदों से देखने गया. Satire हम लोग कम ही बनाते हैं. बल्कि पूरी दुनिया ही कम बनाती है शायद. और क्यों कम बनाती है उसका कारण इस फिल्म के पहले सीन में ही है. जैसा कि कई प्रशासन के मारे पत्रकार और activist कह चुके हैं – राजतंत्र एक मगरमच्छ का पेट है जिसमें हम-आप जैसे दो कौड़ी के टिड्डे हजम हुए बिना ही गायब हो जाते हैं.

फिल्म के पहले सीन में इसी आधुनिक-कहावत को visual दे दिया गया है. एक निरी नग्न लड़की बड़ी अदा से चल कर आती है, और काले कपड़ो और नकाब वाले बंदोबस्त-कर्मियों के द्वारा सजाये गए एक कमरे में घुसती है. उस कमरे में एक बड़ा, घिनौना मगरमच्छ उसका इंतज़ार कर रहा है. लड़की अपनी टाँगे खोलकर मगरमच्छ को दिखाती है…और फिर धीरे धीरे उसके पेट में समा जाती है. यह सीन जितना shocking है, उतना ही अद्भुत भी क्योंकि इसको देखने के बाद वो कहावत सिर्फ कहावत नहीं रह जाती – एक possibility बन जाती है, literally.

The Minister

ये अजीब सा दृश्य असल में फिल्म के मुख्य किरदार Bertrand का सपना है. Bertrand French सरकार में ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर है और उसकी ज़िंदगी में अब वो समय आने वाला है जहाँ उसको मगरमच्छ और नग्न लड़की, दोनों की ही भूमिका निभानी है. मेरे लिए फिल्म का असली hook, satire, वैसे काफी कम है. या इतना subtle है कि उसे keen observations कहा जा सकता है, satire नहीं. लेकिन बड़े गज़ब के keen observations हैं. जैसे कि किसी बड़ी दुर्घटना के बाद Minister की प्रेस कांफ्रेंस में कैसे उसकी tie का रंग भी उतना ही सही रखा जाता है जितना उसके बयान में sympathy और empathy का mix.  या bureaucrat-politician complex जिसमें दोनों को लगता है कि सरकार वो चला रहे हैं, सामने वाला तो चूतिया है.

Satire ना सही, लेकिन फिल्म बहुत गाढ़ी है. एक नयी दुनिया, वो दुनिया जो हम सबको चलाती है, के अंदर घुसती है और उसकी सारी खाल कुरेद-कुरेद कर दिखाती है. Bertrand का देश, बाकी के यूरोप (और India) की तरह, privatization vs. public sector debate से गुज़र रहा है और Bertrand को कभी दिल कभी दिमाग से इस खेल में अपनी चालें चलता है. तो एक तरह से फिल्म सिर्फ Bertrand की character study तक सीमित ना रहकर, The Minister as a concept/ideology को study करती है. बीच बीच में technical lingo की वजह से भारी भी होती है लेकिन इतने insightful तंत्र को जानने के रास्ते में ये छोटी दिक्कतें हैं.

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बेला टार के घोड़े की हत्या

दूसरी फिल्म देखने गए (मास्टर कहे जाने वाले) Bela Tarr की The Turin Horse. लेकिन projection में कुछ दिक्कतों की वजह से subtitles कट रहे थे इसलिए अब शायद रात को screening दोबारा हो. जनता काफी गुस्से में थी और वाजिब भी है. (वैसे मुझे आजकल गुस्से में आए लोगों को देखकर हँसी आती है.) अभी सिर्फ १५-मिनट की देखी और visually खतरनाक है. पहले सीन में घोड़ा चलते हुए (single shot) तब तक दिखाया है जब तक उसकी थकान हम तक नहीं पहुँच जाती और उसके आगे वाले पैर आदमी के हाथ नहीं लगने लग जाते. सच में ऐसा ही लगता है. Bela Tarr के बहुत बड़े fan नीरज घायवान के हिसाब से ये फिल्म भी उनकी बाकी फिल्मों की तरह attrition (यानी की थका देने की हद तक visuals को निचोड़ने की कोशिश) को अपना style बनाती है. अब रात में देखेंगे तब बाकी पता चलेगा.

Updates:

The death of Bela Tarr’s horse

Bleak, stunning, and murdered by MFF

The most bizarre and unfortunate thing happened with Bela Tarr’s The Turin Horse. The first screening in the morning was aborted (stopped 30-mins into the film) as they couldn’t project the film right. Yes. In a film festival, presenting one of the biggest draws of the schedule, they DIDN’T KNOW HOW TO PROJECT A FILM PRINT!

The film was rescheduled for a late night screening. We waited in queues for 45 minutes and when we got in – the first visuals on screen broke our hearts. They were playing it off a fucking DVD, with “TCR 1:20:20:14 PLAY LOCK” (the number being a running counter) printed at the bottom. Not only this, the print was much inferior, the screen darker, the sound almost a buzz, and suddenly, from what looked like a visual masterpiece in the morning started looking like (as Kartik Krishnan put it) – a state made documentary on how poor people boil potatoes. We walked out of the screening a second time in the day, this time hopeless and very angry. Ok, not as angry as amused that they’d play it off a screener DVD, the same copy that is already available on torrents for a month. I wouldn’t do such a thing to my best friends even.

And it’s as much an insult to the festival audience as it’s to the filmmaker’s work. No filmmaker, no matter how ordinary or great, wants his film to be projected wrongly. I have seen short filmmakers panicking for good quality headphones while showing their films to friends. (Recently, Terrence Malick sent out projection guidelines to screens across USA for his ‘The Tree of Life’.) And that is how it should be. Every frame, every little hint of a sound, has been put together after, sometimes, years of work and reason and deliberation. If even film festivals disregard basics – hope will soon fade out. Boo to the festival organizers and director! And of course to Cinemax Versova (though they care a rat’s ass, I’m sure.)

The prologue of The Turin Horse tells us about how the great philosopher Friedrich Nietzsche once saw a horse being flogged badly and something snapped inside him. He went ahead and hugged the horse and cried like crazy. After 2-days of silence and illness, he lost his sanity forever. Though nobody knows what happened to that horse. (The film is story of that horse and its owner.)

After the depressing (alternatively laughable) state of affairs yesterday, it doesn’t seem too big a stretch to imagine Bela Tarr hugging and crying over his film being flogged by Mumbai Film Festival organizers.

कठो उपनिषद – कुछ भी

दोपहर में देखी ये फिल्म (कठो उपनिषद) जो सिर्फ इसलिए देखी क्योंकि मृत्यु से संवाद जैसा विषय मुझे आजकल बहुत खींचता है. Mid-life crisis का पहला sign है शायद. लेकिन फिल्म में देखने लायक कुछ मिला नहीं. ३ अध्याय थे. तीनों को एक-एक single-shot में लिया गया था. बस वही चमत्कार था. उसके अलावा लेखक-निर्देशक आशीष अविकुन्तक कुछ नहीं बता पाए. यम और नचिकेता के बीच का संवाद होना था जिसमें हमें मृत्यु के बारे में कुछ गहरे राज़ मिलने थे. लेकिन फिल्म समाप्त हो गयी और मिला corporate jargon जैसा ‘शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है’. जो हमें तब से पता है जब से हमें शरीर और आत्मा का फर्क भी नहीं पता था.

Above us only sky – Beauty of loss

Sandra Huller was stunning as Martha

Jan Schomburg’s German film Above us only sky was one of those moments where you can actually feel the film slipping out of your hands, and be sad about it. For the initial 40-minutes or so – Jan takes us on an internal journey, a journey kicked off by the sudden suicide of a lovely and loving lady’s now-silent, now-normal husband. It’s the external journey, the lady’s trip to cope with this loss, that is either implausible or not expressed cinematically. The film frustrates, and not in the way bad films do, but in a personal way. Like when you see a friend going on a self-defeating trip. The abrupt last chunk didn’t help things either. Still, I’d watch it again for the magical initial 40-minutes.

 

 

 

7 thoughts on “MFF Diary – Day 1 (updated)

  1. डायरी का आईडिया बहुत पसंद आया. फेस्टिवल की झलकियाँ तो देख लेंगे, अपनी आँखों से ना सही किसी और की सही🙂

    • शुक्रिया. देरी से कमेन्ट के लिए माफ़ी…फेस्टिवल के दौरान सुबह से रात भगदड़ थी और उसके बाद सफ़र पे निकल गए.

  2. “… यह सीन जितना shocking है, उतना ही अद्भुत भी क्योंकि इसको देखने के बाद वो कहावत सिर्फ कहावत नहीं रह जाती – एक possibility बन जाती है, literally.”

    I find a touch of Walter Benjamin (especially Illuminations, google it) in these posts. I think you have hit the key element of writing a commentary, that you, as a writer, is as important as the thing being commented on. And to that, a touch of self-effacive humour…Stubs of thought which forge myriad links between the event and the micro-conversations around it/in it.

    Both you and Mihir write about what you ‘see’, but with theoretical overtones. Usually, such literature in Hindi is lost on me (yes, I am sorry but I am not in a position to understand ‘ideology’ in Hindi). But, I have till now been able to read both of you, without feeling lost🙂

    Thanks for this.

    • Thanks Aprajita, just downloaded Illuminations (Yes, I download everything)…will read it soon. I think you should have taken time out for the festival….it would’ve been worthwhile. Couldn’t even write the last two days’ diary because of bad health and travel as soon as the fest got over.

      And to the observation about my writing, I’d see it’s the easiest ‘style’ or ‘form’ to stick to when writing a quick diary. Saves the mental space and energies otherwise invested in being correct and intelligent.🙂

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