MFF Diary – Day 4

फिर सुबह

आज सुबह-सुबह ऑटो वाले ने हड़का दिया. मैंने कहा जल्दी चलो फिल्म छूट जायेगी, तो उसे गुस्सा आ गया कि मैं सोमवार को सुबह ९ बजे फिल्म देखने जा रहा हूँ. जब मैंने कहा मेरा काम है फिल्म देखना तो भी वो नहीं माना. बोला फिल्म देखना काम कैसे हो सकता है. मैंने कहा मैं फिल्म देखकर उसके बारे में लिखूँगा. उसने कहा “फिल्म के बारे में लिखा कोई क्यों पढ़ेगा? फिल्म तो देखने की चीज़ है.” यहाँ मुझे Martin Mull या किसी और की कही हुई शानदार बात याद आ गयी कि – Talking about music is like dancing about architecture.

पर हम, फिर भी लिखे जा रहे हैं.

आसमान से गिरती गाय

Chinese Takeaway

Sebastian Borensztein की Argentinian फिल्म Chinese Takeaway के पहले ही सीन में आसमान से एक गाय गिरती है और एक नाव में बैठी लड़की उसके नीचे दब कर मर जाती है. अखबार में आने वाली इस तरह की खबरों को जमा करने वाला एक हार्डवेयर दुकान का मालिक हमारा नायक है. शायद उसकी ज़िंदगी पेंच-छर्रे-रिवेट बेचते बेचते इतनी बोरिंग हो गयी है कि freak accidents के रोज़मर्रा उदाहरणों से नीचे कुछ भी उसे मज़ा नहीं दे सकता.

यहाँ मुझे याद आया कि बचपन में गर्मी की छुट्टियों में नानी के घर यमुनानगर जाने का एक highlight ये भी होता था कि वहाँ हमें ‘पंजाब केसरी’ अखबार मिलेगा जिसमें पहले ही पेज पर कहाँ कौन सा बच्चा अपने गुब्बारे के साथ उड़ गया या कहाँ किस किसान ने २० किलो का प्याज उगाया या कहाँ कौन सी बुढिया मरने के ८-घंटों बाद फिर जिंदा हो गयी जैसी खबरें भर-भर के मिलेंगी. Morbid fascination बचपन में काफी ज़्यादा होता है. बड़े होकर वही अपने डर में बदल जाता है. मेरे साथ तो कम से कम यही हुआ.

खैर…फिल्म का नायक, जो दुनिया में एकदम अकेला है और किसी पुराने प्यार को भी वापस अपनी ज़िंदगी में आने से stonewall ही कर रहा है, इन खबरों को बड़े सलीके से संजो के रखता है. और एक दिन, ऐसी ही एक अजीब खबर उसकी ज़िंदगी में चली आती है. अर्जेंटीना में, सड़क पर उसे एक ऐसा चीनी शरणार्थी मिल जाता है जिसे स्पैनिश का आधा स भी नहीं आता. और उसके आने से chaos theory की एक ऐसी लड़ी शुरू होती है जिसमें एक उदास, अकेले जीवन पर meditation, एक निरंतर खोज, और दुनिया की randomness पर एक बहुत ही नया perspective एक-एक कर के सामने आते हैं.

Ricardo Darin, जिन्हें मैं South American इरफ़ान खान मानता हूँ, फिल्म को कई कंधे ऊपर ले जाते हैं. और सुबह-सुबह मुम्बई के खतम-ट्रैफिक से जूझने को अपनी आँखों से ही सार्थक कर देते हैं.

रंगीन अखबार 

Tabloid

जिसे कह सकते हैं दिव्य-योग….कि हमने सुबह देखी एक ऐसी फिल्म जिसमें बंदा पंजाब केसरी जैसे मसाला-अखबारों में से खबरें ढूँढता है और दोपहर को देखी एक डॉक्यूमेंट्री जो हमें एक मसालेदार, voyeuristic खबर के अंदर ले जाती है. Errol Morris की डॉक्यूमेंट्री Tabloid (ट्रेलर यहाँ देखें: http://www.youtube.com/watch?v=TWeQce0cZsE) एक ऐसी juicy tabloid story के अंदर कूदती है जिसमें sex, religion, crime, celebrity और emotional hook का बराबर मिश्रण है. ७० के दशक में, अमेरिका की एक छुटभैय्या ब्यूटी क्वीन अपने प्यार का पीछा करते करते ब्रिटेन आ जाती है. उसका प्रेमी यहाँ एक आधुनिक चर्च में पादरी बनने आया है. यहाँ से कहानी के तीन रास्ते खुलते हैं, जिनमें ब्रिटेन के २ Tabloids और लड़की, कहानी का अपना-अपना version बताते हैं.

लड़की उसका अपहरण कर के उसके साथ सेक्स करती है. लड़की उसका अपहरण नहीं करती बल्कि वो खुद अपनी मर्ज़ी से उसके साथ जाता है और सेक्स करता है. लड़की अपहरण करती है लेकिन लड़का इस अपहरण से खुश है.

लेकिन फिल्म इस मुद्दे पर नहीं है कि लड़की ने उसके साथ क्या किया. फिल्म उस सतरंगी दुनिया पर है जो इस तरह के कयासों पर टिकी है – पत्रकारों, फोटोग्राफरों, राखीसावंतनुमा सेलिब्रिटीज, इन सेलिब्रिटीज के आस-पास घूमने वाले parasites, और एक बहुत ही चुपचाप तरह से, इन अखबारों को ट्रेन में एक पाँव पर खड़े होकर, २-फोल्ड मारकर पढ़ने वाले हम जैसे लोगों से बना ये tabloid food-chain.

लेकिन ये food-chain ऊपर से नीचे वाला नहीं है. इसे food-circle कहना ज़्यादा अच्छा होगा. सब एक दूसरे को खा रहे हैं, और एक दूसरे को खाना ही इनका final product है…असली खबर.

बहुत ही चुटीले अंदाज़ में बनायी गयी ये डॉक्यूमेंट्री आपका विचार बदल सकती है कि डॉक्यूमेंट्री का मतलब है बोरिंग, समाज-सुधारक वक्तव्य. इतना मज़ा अच्छी-अच्छी बड़े बजट की मसाला फिल्मों में नहीं आता जितना इन सचमुच के किरदारों को एक ३०-साल पुराने २-कौड़ी के केस पर बतियाते हुए आता है. और फिल्म खुद कहीं से voyeuristic नहीं है – बस एक बहुत ही insightful, कड़क reflection है मीडिया और हमारे basic instincts पर.

घोड़ा दर-बदर

फिल्म की जगह-जगह तारीफ़ सुनी थी और कहीं पढ़ा था कि इसमें satire का element है, इसलिए देखने पहुँच गए. Suseenthrian की तमिल फिल्म Azhagarsamiyin Kudhirai (अड्गस्वामी का घोड़ा) लेकिन फिल्म के नाम पर धोखा था. ऐसी फिल्म किसी फिल्म फेस्टिवल में पहुँच गयी यही थोड़ा आश्चर्य है. मूल कथा अच्छी है…लेकिन उसे बनाने का तरीका ठेठ मसाला. एक गाँव के कुल देवता के मंदिर से लकड़ी का घोड़ा गायब हो जाता है तो उसकी जगह लोग एक गरीब का घोड़ा पकड़ के वहाँ बिठा देते हैं. उसके बाद वो गरीब कैसे अपना घोड़ा वापस पाता है और गाँव का खोया घोड़ा कैसे वापस मिलता है यही कथा है. लेकिन २ घंटे तक फिल्म इस मामले को छोड़कर हर दिशा में दौड़ती है. २ प्रेम कहानियाँ, ३ गाने, गाँव का एक casanova, तीन-चार fight scenes, और अंत में ‘तेरी महरबानियाँ’ टाइप घोड़े का मालिक को बचाने का एक्शन. और सब कुछ ऐसा loud कि सर घूम गया कसम से.

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